
नवम्बर 1949 संविधान वाचन व चर्चा का तीसरा अधिवेशन शुरू न शुरू हुआ। चर्चा का उत्तर देने के लिए बाबासाहेब ज्यों ही खड़े हुए तो तालियों व जयघोष के साथ सभा भवन गूंज उठा। इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक भाषण में संविधान के शिल्पी अंबेडकर ने कहा, ” मैं संविधान सभा में क्यों आया? सर दलित, शोषित व उपेक्षित वर्गों के हितों की रक्षा वर्गों के हितों की रक्षा लिए। इस से अधिक मेरी कोई आकांक्षा नहीं थी। यहां मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, इसकी मुझे कल्पना तक नहीं थी। संविधान सभा की मसौदा कमेटी में जब मुझे नियुक्त किया तो मुझे ताजुब्ब हुआ लेकिन जब मसौदा कमेटी ने मुझे अपना अध्यक्ष चुना तो आश्चर्य का धक्का सा लगा। मुझ पर इतना बड़ा विश्वास कर एक माध्यम के रूप में राष्ट्र सेवा करने का मुझे मौका दिया, उसके लिए में संविधान सभा व प्रारूप समिति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूं। उन्होंने आगे कहा, ” महानुभावो ! संविधान कितना ही अच्छा हो यदि उस पर अमल करने वाले लोग अच्छे नहीं हो तो संविधान बुरा होने की पूरी संभावना है और यदि अमल करने वाले अच्छे हो तो संविधान भी हितकारी हो सकता है। यह नहीं कहा जा सकता कि इस संविधान पर अमल करने वाले लोग कैसे होंगे।
आगे बोलते समय बाबासाहेब का स्वर गंभीर हो गया। देश के भविष्य के बारे में चिंता प्रकट करते हुए उन्होंने कहा, “28 जनवरी 1950 को संविधान लागू करके यह देश स्वतंत्र होगा। उसकी स्वतंत्रता का आगे क्या होगा ? एक समय यह देश स्वतंत्र था। भारत राष्ट्र की स्वतंत्रता खत्म हुई थी इसका मुझे दुख है लेकिन अपने ही लोगों के विश्वासघात से हम स्वतंत्रता खो बैठे, इसका मुझे अधिक दुख है। क्या इतिहास फिर अपने को दोहरायेगा इस विचार से मुझे देश के भविष्य की चिंता हो रही है। जिस समय सिंध पर मुहम्मद बिन कासिम ने आक्रमण किया उस समय राजा दाहर के सैनिकों ने मोहम्मद बिन कासिम से रिश्वत ली और उन्होंने दाहर की ओर से लड़ने से इन्कार कर दिया।
चेतावनी ! क्या इतिहास स्वयं को फिर दोहरायेगा ?
जब शिवाजी हिन्दुओं की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे तब राजपूत और दूसरे मराठा सरदार मुगल बादशाहों के समर्थन में लड़ रहे थे। जब ब्रिटेन सिखों के खिलाफ लड़ रहा था तब सिख राजाओं के सेनापति चुप बैठे रहे और उन्होंने सिख राज को बचाने के लिए कुछ नहीं किया। 1857 इस्वी में जब भारत के बहुत से भागों में ब्रिटिश राज के खिलाफ संघर्ष शुरू हुआ तब सिख मौन दर्शक बन कर यह देखते रहे।
उन्होंने हॉल में बैठे महानुभावों की ओर देखते हुए कहा “क्या इतिहास स्वयं को फिर दोहरायेगा ? उन्होंने भारतवासियों से अपील कि वे स्वतंत्रता की रक्षा करें, हमें अपने रक्त की अंतिम बूंद बहाकर भी स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने जातिवाद का संपूर्ण बहिष्कार करते हुए सच्चे सामाजिक व मनोवैज्ञानिक दृष्टि से एक राष्ट्र के रूप में विकसित करने की अपील की। क्या भारतीय जनता अपने मत, धर्म, पंथ या पक्ष की अपेक्षा देश की अधिक महत्व देगी ? या देश की अपेक्षा अपने पंथ या पक्ष या पार्टी को ही श्रेष्ठ समझेगी ? यदि पंथ या पक्ष को प्रधानता दी गई तो देश फिर एक बार मुसीबत में फंस जाएगा। इस मुश्किल से हमें दृढ़ता के साथ देश की रक्षा करनी चाहिए।
“यदि हम लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते है तो हमें अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्य संवैधानिक रास्ते से ही प्राप्त करने चाहिए, हिंसात्मक मार्ग से नहीं इसलिए असहयोग, कानून भंग और सत्याग्रह का मार्ग छोड़ देना चाहिए। क्योंकि संविधान से बाहर का मार्ग केवल अराजकता की ओर ले जाएगा।
नायक पूजा (Hero Worship): भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा
भारत के लोकतंत्र को एक अन्य बात से खतरा है वह नायक पूजा। इस देश की राजनीति में जितनी भक्ति और नायक पूजा है उतनी अन्य किसी देश में नही है। “जॉन स्टुअर्ट मिल ने कहा था कि कोई व्यक्ति कितना ही महान क्यों न हो, उसके चरणों में अपनी आजादी कभी अर्पित नहीं करनी चाहिए या हमारी संस्था का विनाश करने के लिए वह शक्तिशाली बन जाए, इतनी सत्ता भी उसे नहीं देनी चाहिए।
जिन लोगों ने जीवन भर देश की सेवा की है उनके प्रति श्रद्धा या कृतज्ञता प्रकट करना कोई गलत नहीं लेकिन इसकी भी सीमा होती है जैसे आयरलैण्ड के देशभक्त डेनियल कैनल ने कहा है, “कोई पुरूष अपना सम्मान गंवा कर यानी स्वाभिमान की बलि देकर या कोई भी स्त्री अपनी सतीत्व भंग करवा कर धन्यवाद अदा नहीं कर सकती और कोई राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता खोकर कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सकता। भारत के संबंध में ज्यादा ध्यान रखना जरूरी है क्योंकि यहां राजनीति में व्यक्ति पूजा सीमा से बाहर है। धर्म में भक्ति मन की आत्मा की मुक्ति मार्ग दिखा सकती है लेकिन राजनीति में नायक पूजा पतन की ओर धकेलती है और अंत में तानाशाही की ओर ले जाएगी, यह तय है।
अपने भाषण में उन्होंने तीसरी अहम बात कही कि हमें केवल राजनीतिक लोकतंत्र से ही संतोष नहीं करना चाहिए। हमें यह कोशिश लगातार करनी चाहिए कि यह प्रजातंत्र हमारे सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में भी पूरी तरह समा जाये यानी प्रजातंत्र सिर्फ राजनीतिक ही नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक भी होना चाहिए। राजनीतिक लोकतंत्र तब तक कायम नहीं हो सकता जब तक उसकी बुनियाद में सामाजिक लोकतंत्र अर्थात स्वतंत्रता, समानता व भाईचारा न हो। समानता के बिना स्वतंत्रता का अर्थ है बहुसंख्यकों पर मुट्ठी भर लोगों का राज । भाईचारे के बिना स्वतंत्रता व समानता स्वाभाविक सी बातें नहीं लगेगी। सदन को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि भारतीय समाज में सामाजिक व आर्थिक समानता का अभाव है।
सामाजिक व आर्थिक विषमता को मिटाना जरूरी
अपने भाषण के अंत में देश के नागरिकों को देश के सामाजिक व आर्थिक क्षेत्र जीवन में व्याप्त घोर विषमताओं का जिक्र करते हुए कड़ी चेतावनी शब्दों में कहा, ” 26 जनवरी 1950 से हम विषमताओं के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हे है। है। राजनीति में हमें समानता का हक होगा लेकिन सामाजिक व क जीवन में विषमता यानी असमानता विषमता यानी असमानता ही बनी रहेगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक वोट और एक मूल्य को मान्यता देंगे। हमारे सामाजिक और आर्थिक ढांचे के कारण हम सामाजिक और आर्थिक जीवन में एक वोट एक मूल्य के सिद्धांत को नकारेंगे। आखिर कब तक हम सामाजिक और आर्थिक में समानता को अस्वीकार करते रहेंगे? यदि हम लंबे समय तक इसे नकारते रहेंगे तो हम हमारे राजनीतिक लोकतंत्र को भी खतरे में डालेंगे। हमें इन विषमताओ को जितना जल्दी हो सके समाप्त कर देना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो जो लोग भेदभाव व विषमताओ से बुरी तरह से शिकार है वे राजनीतिक लोकतंत्र की उस व्यवस्था को ही जलाकर राख कर देंगे जिसे इस संविधान सभा ने कड़ी मेहनत से बनाया बनाया है।”
बाबासाहेब ने अपने भाषण में आगे कहा, “हमारे अन्दर भ्रातृत्व भाव की भारी कमी है जिस जातिभेद के कारण हमारे सामाजिक जीवन में अलग अलग गुट बन गए हैं उस जात पांत के जातिभेद को मिटाकर हम भारतीय सामाजिक व मानसिक रूप में एक नया राष्ट्र बनाएं। जातियां राष्ट्र विरोधी है, जातियां हमारे सामाजिक जीवन में अलगाव पैदा करती है। जातियां राष्ट्र विरोधी है क्योंकि यह जाति और जाति के बीच ईष्या और घृणा पैदा करती है। हम एक राष्ट्र है ऐसा मानना मानना आत्म आत्म वंचना पंचना है हजारों जातियों में बंटे हुए लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते है? इसलिए यदि हम सच्चे अर्थो में राष्ट्र बनाना चाहते है तो हमें इन बाधाओं पर विजय पाना होगा।
हजारों जातियों में बंटे लोग, भला एक राष्ट्र कैसे ?
मेरे ये विचार कुछ लोगों को जनता के लिए शायद अच्छे नहीं लगे। इस देश में लंबे समय से मुठ्ठी भर लोगों का वर्चस्व रहा है और बहुत सारे लोग तो केवल बोझा दोने वाले पशु ही नहीं बल्कि शिकार किए जाने वाले जानवर ही बने रहे है। इस शोषणकारी वर्चस्व ने उनको न केवल बेहतर जीवन से ही वंचित रखा है बल्कि उनका जीवन रस ही चूस लिया है। इन दबे कुचले लोगों का मन अब उन पर दूसरों द्वारा राज्य किए जाने से भर चुका है वे अपने ऊपर स्वयं ही राज करने के लिए बेचैन है।
“दबे कुचले लोगों को आत्म चेतना की इस भावना को वर्ग संघर्ष या वर्ग युद्ध का रूप धारण करने नहीं देना चाहिए इससे घर का बंटवारा होगा। वह दिन तबाही का होगा जैसा कि अब्राहम लिंकन ने कहा है कि जो घर फूट का शिकार है वह ज्यादा दिनों टिका नहीं रह सकता इसलिए जितनी जल्दी उनकी इच्छाओं की पूर्ति की जाए उतना ही इस देश, इसकी आजादी और इसके लोकतंत्र ढांचे के लिए अच्छा है। यह जीवन के सभी पहलुओं में समानता और भाईचारा पैदा करके ही हो सकता है इसी कारण मैंने इस पर इतना जोर दिया है।
बेशक देश की आजादी खुशी का अवसर है लेकिन हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आजादी ने हमारे ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी डाल दी है।पहले हालात बिगड़ते तो हम ब्रिटिश सरकार को दोषी ठहराते थे। आजादी के बाद तो वह बहाना भी खत्म हो गया है यदि आजादी के बाद देश की दशा बिगड़ी तो इसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार होंगे और हालात बिगड़ने के बहुत बड़े खतरे हमारे सामने है समय बहुत तेजी से बदल रहा है लोग, जिसमें भारत के लोग भी शामिल है, नई नई विचार धाराओं से प्रभावित हो रहे है। वे जनता द्वारा सरकार से अब उकता चुके है, वे अब जनता के लिए सरकार चाहते है। उनको इस बात की चिंता नहीं है कि यह जनता द्वारा जनता की सरकार है भी या नहीं। जिस संविधान में हमने ‘जनता के लिए, जनता का और जनता द्वारा’ तत्व निहित किए है वह संविधान लम्बे समय तक बना रहे, यदि ऐसा हम चाहते है तो हमें हमारे सामने मौजूद संकटों को समझने में और उनको दूर करने में देर नहीं करनी चाहिए। देश की सच्ची सेवा करने का यही मार्ग है।
संविधान सभा में संविधान निर्माता बाबासाहेब का जय घोष
चालीस मिनट के इस धारा प्रवाह भाषण में समाज व देश के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्रों के संकटों व प्रगति का मार्मिक व सावधान करने वाला जो संदेश दिया उससे पूरा सदन गद्गद् हो गया। संविधान निर्मात्री सभा में संविधान के प्रारूप पर बहुत बहस हुई। सभा को सदस्यों ने संविधान की हर धारा पर सवाल किये और हर सवाल का जवाब बाबासाहेब ने बहुत ही विस्तार से दिये। हर शंका का समाधान उनके उत्तर में था। सदस्यों ने पूरी तन्मयता से सुना और सराहा। भाषण के बीच में व आखिर में संविधान सभा के सदस्यों ने बाबासाहेब का जय घोष किया। दूसरे दिन सभी अखबारों में यह भाषण छापा और बाबासाहेब की विद्वता व दूरदर्शिता की सराहना की। अंबेडकर कानून, समाज शास्त्र, विश्व के संविधानों, न्याय शास्त्र तथा मानव शास्त्र के प्रकांड विद्वान थे। उनकी यह महान योग्यता भारत के संविधान निर्माण में बहुत सहायक साबित हुई। संविधान सभा के सदस्यों ने उनकी विद्वता, कुशलता व कार्य क्षमता की दिल खोलकर प्रशंसा की। कई सदस्यों ने उन्हें आधुनिक मनु और बीसवीं सदी का स्मृतिकार भी कहा।
26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को स्वीकार किया इस दिन संविधान सभा के अध्यक्ष डा. राजेन्द्र प्रसाद ने उनकी प्रशंसा इन शब्दों में की- “अध्यक्ष के आसन पर बैठकर मैं रोजाना की कार्यवाही को बहुत ही निकट से ध्यानपूर्वक देखता रहा इसलिए संविधान प्रारूप समिति के सदस्यों सकर इसके अध्यक्ष डा. अंबेडकर ने अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद जिस निष्ठा व उत्साह से यह कार्य पूरा किया इससे अधिक कोई नहीं कर सकता था इसकी कल्पना औरों की अपेक्षा मुझे अधिक है। हमने आज दिन तक ऐसा कोई सही निर्णय नहीं लिया, न भविष्य में लेंगे जैसा हमने उन्हें प्रारूप समिति का अध्यक्ष बना कर लिया है। उन्होंने न केवल अपने चुने जाने को सार्थक बनाया बल्कि उन्होंने अपने इस कार्य को एक विशेष सम्मान व गरिमा न की है। सदन बीच बीच में तालियों से गुंजायमान हो रहा था।
सभी ने एक स्वर में कहा :महान देशभक्त डॉ. अंबेडकर
मुस्लिम नेता ताजामुल हुसैन ने इस संबंध में कहा, “संविधान निर्माण का श्रेय कानून मंत्री डा. अंबेडकर को जाता है, वे प्रतिभाशाली है। उन्हें विश्व के संविधानों और कानूनों का समग्र ज्ञान है उन्होंने अपने स्वास्थ्य की परवाह किए बिना शुरू से आखिर तक कठिन मेहनत की। उनके इस कठोर परिश्रम की वजह से ही यह महान संविधान बन पाया है।
पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा, ” डा. अंबेडकर ने भारत के संविधान के निर्माण में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। समाजवादी नेता एच.वी. कामथ ने कहा, ” डा. अंबेडकर की कानूनी योग्यताओं का लोहा माना जा चुका है यदि वह चाहे तो रात को दिन में और दिन को रात में बदल सकते है यही नहीं वह इसे पूरी तरह से साबित भी कर सकते है।
कांग्रेस के इतिहासकार डा. बी. पट्टाभिसीतारमैया ने अपने भाषण में कहा, “हमने गुलामी को कोपरेटिव कॉमनवेल्थ में बदल दिया है। यह केवल तीन सालों की हमारी मेहनत और हमारे महान देश के अनुरूप बहुत बड़ी उपलब्धि है। कनाडा अपनी आजादी सन् 1842 के 25 वर्ष बाद 1867 में अपना संविधान पूरा कर पाया था हमने अपने संविधान को पूरा करने में सिर्फ तीन साल लगाए है।
“डा. अंबेडकर की बुद्धि इस महत्वपूर्ण और विशाल काम के लिए स्टीम रोलर की तरह थी। बिल्कुल अदृश्य व अजेय जिसने बड़े बड़े पाप के वृक्षों और छोटे-छोटे पापी पेड़ों को गिराकर सफलता पैदा कर दी। उन्हें देश हित में जो सही लगा, परिणाम की परवाह किए बिना उसके लिए डट गये।”
संविधान निर्माण के बाद उनके घोर विरोधी व्यक्ति व अखबार भी उनकी प्रशंसा के पूल बांधने लगे। ज्यादातर ने यही कहा कि उन्होंने अंबेडकर को समझने में भारी भूल की, वह महान देशभक्त व समाज सुधारक है।
संविधान सभा में प्रारूप समिति के कई मामलों में अंबेडकर के कड़े आलोचक रहे यशवंत राय कपूर ने अंबेडकर की देश सेवा के प्रति अपनी भावनाएं प्रकट करते हुए लिखा, “डा. अंबेडकर और उनके साथी उस सराहना के सुपात्र है जो हर वक्ता ने उनकी की है मुझे शुरू में अंबेडकर के प्रति बहुत घृणा थी लेकिन उनके द्वारा संविधान निर्माण के बहुत ही उपयोगी व देशभक्तिपूर्ण काम की वजह से मेरे मन में उनके लिए सम्मान व प्यार पैदा हो गया है। इनके भाषण ने मेरी शंकाओं को दूर कर दिया है। आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि वह एक महान देशभक्तों में से एक है।
