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तिलक राज बेहड़ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मांगी माफी।

सौरभ से नहीं मेरा कोई नाता

 

“पूत कपूत तो का धन संचय,
पूत सपूत तो का धन संचय”

इन पंक्तियाँ का अर्थ क़िस्मत ने तिलक राज बेहड़ को सबसे निर्मम तरीके से समझाया। एक पिता की वर्षों की प्रतिष्ठा दाँव पर लगा गई। अपने ही बेटे सौरभ राज बेहड़ के अक्षम्य अपराध से रूबरू होना, शायद वही क्षण है जहाँ भाग्य मनुष्य से कहता है: तुमने जो सोचा था, वह तुम्हारे हक में कभी था ही नहीं।

मुकद्दर ने ऐसा खेल खेला कि बेहड़ के लिये अपने बेटे की हरकतों का ख़ुलासा केवल शर्मनाक ही नहीं, बल्कि आत्मा के टूटने का दिन था। फिर भी, इसी टूटन में बेहड़ ने वह किया जो बहुत कम लोग कर पाते हैं। बेहड़ ने शोर नहीं मचाया, सफ़ाई नहीं गढ़ी, न ही सहानुभूति का सौदा किया।

बेहड़ ने शालीनता को चुना।

एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस, कोई लीपापोती नहीं, कोई बयानबाज़ी नहीं, बस दो टूक स्वीकारोक्ति। यह स्वीकार किया कि पुत्र ने निजी जीवन से उपजी समस्याओं को सुलझाने के लिए जो “हमले” का स्वांग रचाया, वह असत्य था। और असत्य के साथ खड़े रहना जीवन को खो देने जैसा है।

राजनीति से भरे इस समय में, जहाँ हर चेहरा मुखौटा है और हर शब्द बचाव, कुछ ही लोग शेष हैं जिन्हें देखकर लगता है कि सार्वजनिक जीवन में आदर्श अभी पूरी तरह मरे नहीं हैं। बेहड़ ने उसी दुर्लभ वर्ग में स्वयं को खड़ा कर दिया जहाँ सत्ता से ऊपर आत्मसम्मान और चतुराई से ऊपर सत्य रखा जाता है।

बेहद शालीनता से तिलक राज बेहड़ ने राजनीतिक और राजनीतिज्ञ के बीच का फ़र्क़ बता दिया।

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